आवेश जी, सबसे पहले तो धन्यवाद. आपने पत्रकारिता जगत में महिलाओं की वास्तविक स्थिति के बारे में लिखा. पिछले तीन महीनों से मुझे नौकरी नहीं मिल पा रही. सारी डेस्क और हर तरह की रिपोर्टिंग का अनुभव होने के बावजूद कुछ ऐसी शर्तें रख दी जाती हैं कि आप नौकरी कर ही नहीं सकते. पिछले तीन महीनों में भोपाल के कई बड़े पत्रकारों से मिलना हुआ. अनुभव बहुत कटु रहे. एक बड़े अखबार के संपादक ने तो केवल इसलिए हैरानी जताई कि मुझे उनका नंबर आखिर मिला कैसे.






: दुबे जी हमारे लिए प्रेरणास्रोत बन गए थे : दुबे जी ने कहा था- आप लोग शुरू करो, दिल्ली से हर संभव मदद का वायदा करता हूं। अफसोस, उनके सपनों को हम छोटी-मोटी कोशिशों से साकार कर पाते, इससे पहले वह चले गए। उम्र के इस मुकाम पर पहुंचकर भी उनके अंदर के जज्बात, हौसले, उर्जा, उनके सपनों, स्नेह, और सम्मान को समझा जा सकता था। आज सचिन भाई की पोस्ट से जब यह सूचना मिली तो पूरा दफ्तर सन्न था।
: अंत में कांग्रेस प्रत्याशी नवीन जिंदल ने कहा कि संजय जी से बात हुई है, वैश्विक वित्तीय संकट की मार झेल रही कंपनी को मैं कुछ न कुछ मदद जरूर करूंगा : नकारात्मक समाचारों की जब हद हो गई तो अवतार भड़ाना की पत्नी ने फोन मिलाकर संजय गुप्ता जी की ऐसी-तैसी कर दी : चेतन शर्मा बोले कि जागरण के कार्यक्रमों में बिना कोई पैसा लिए शामिल होता हूं तो जागरण को चुनाव कवरेज के लिए पैसे क्यों दूं? :
: भाग 28 : दिवाली के बाद पहली बार छुट्टी लेकर मेरठ आया हूं। अपने पापा को देखने के लिए। उनकी तबियत जरा खराब चल रही थी। चैकअप में चिन्ता की कोई बात नहीं मिली। सुकून मिला। फिर मैं चल पड़ा नौनिहाल के घर की ओर। दिसंबर में सुधा भाभी को पैरेलिटिक अटैक होने के बाद उनके बच्चों से फोन पर बात होती रही थी। दो बार भाभीजी से भी बात हुई थी। फोन पर उन्होंने पहचान लिया था। मुझे लगा था कि वे बहुत ठीक हो चुकी हैं।
