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महाशय चिरकुट जी

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महाशय चिरकुट शब्द पढऩे में आपको जरूर कुछ अटपटा लग रहा होगा। वैसे तो चिरकुट शब्द लगभग सभी लोगों ने सुना  होगा पर 'महाशय चिरकुट' शायद पहली बार सुन रहे होंगे। हमारा यह नायक ऐसा ही है। उसको ऐसे कहना मेरी मजबूरी है। शायद इसके अलावा मेरे पास कोई और शब्द नहीं हैं जिससे इस 'महान' आदमी को नवाज सकूं। महाशय के महान कार्यों को कागजों पर उकेर रहा हूं तो ऐसा मत समझ लीजिएगा कि यह कार्य खुशी-खुशी करने जा रहा हूं। यह भी मेरी मजबूरी है।

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बच्चू, अभी तू आदर्शवाद से ऊपर नहीं उठा

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नौनिहाल शर्मा: भाग 27 : 'दैनिक जागरण' और 'अमर उजाला' ने मेरठ की पत्रकारिता का परिदृश्य ही बदल दिया था। पहली बार मेरठ के पाठकों को अपने शहर और उसके आसपास की खबरें इतने विस्तार से पढऩे को मिलीं। अपने बीच की हस्तियों का पता चला, जिनके बारे में दिल्ली के अखबारों में कुछ नहीं छपता था। मेरठियों को इन अखबारों की आदत पड़ गयी। इससे इन अखबारों का सर्कुलेशन तेजी से बढ़ा।

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हेडलाइंस टुडे और राहुल कंवल का उद्धार

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SN Vinod: निंदनीय है पत्रकारिता पर हमला, किन्तु...! : खबरिया चैनल 'आज तक' कार्यालय पर संघ कार्यकर्ताओं के हमले को जब पत्रकारिता पर हमला निरूपित किया जा रहा है तो बिल्कुल ठीक। पत्रकारों की आवाज को दबाने, गला घोंटने की हर कार्रवाई की सिर्फ भत्र्सना भर न हो, षडय़ंत्रकारियों के खिलाफ दंडात्मक कदम भी उठाए जाएं। दंड कठोरतम हो।

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झंडेवालान पर भेड़िया आया....

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: बेनामी की टिप्पणी-2 : भेड़िया आया.... शाम को एक एसएमएस आया कि झंडेवालान पर क्या करा दिया.... करा दिया ऐसे जैसे झंडेवालान हमारे दद्दा वसीयत में छोड़ गए थे और वहां कुछ भी हो ज़िम्मेदारी हमारी होगी.... खैर रास्ते में थे... तो घर पहुंच कर टीवी खोला... इतने तो समझदार हैं ही कि जानते हैं कि झंडेवालान में सबसे तेज़ चैनल का दफ्तर है....

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'लॉबिंग' के लिए खूब है पत्रकारों की मांग

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: पत्रकारिता नहीं, पत्रकार बिक रहे- अंतिम : लाइसेंस निरस्तीकरण की व्यवस्था हो : बावजूद इन व्याधियों के, पेशे को कलंकित करनेवाले कथित 'पेशेवर' की मौजूदगी के, पूंजी-बाजार के आगे नतमस्तक हो रेंगने की कवायद के, चर्चा में रामबहादुर राय जैसे कलमची भी मौजूद थे.

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सात काम सौंप गए प्रभाष जी

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प्रभाष जी से मेरा पहला परिचय जेपी आंदोलन के समय में उस समय हुआ जब वे रामनाथ गोयनका के साथ जयप्रकाश नारायण से मिलने आए थे। उस समय की वह छोटी सी मुलाकात धीरे-धीरे प्रगाढ़ संबंध में बदल गई। बोफोर्स मुद्दे को लेकर जब पूरे देश में कांग्रेस के खिलाफ आवाज उठने लगी तब उन्होंने मुझे भारतीय जनता पार्टी में भेजने के लिए संघ के अधिकारियों से बात की। उनका मानना था कि जेपी आंदोलन के दौरान जो ताकतें कांग्रेस के खिलाफ सक्रिय थीं, उन्हें फिर से एकजुट करने में मेरी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। वीपी सिंह की सरकार बनने के पहले और बाद में भी मेरा उनसे लगातार संपर्क बना रहा।

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प्रभाष जी, उनके चेले और हम

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बेनामी लाल: बेनामी की टिप्पणी-1 : आज प्रभाष जी का जन्मदिन है, पत्रकारिता के संतों की भीड़ लगेगी। वही संत जिन्हें आज प्रभाष जी अगर होते तो इनमें से कइयों को बेहद निराशा और क्रोध में गरिया रहे होते। कई मठाधीश वहां आएंगे, बैठेंगे, प्रभाष जी को याद करेंगे, पत्रकारिता की दशा पर क्षोभ और ग्लानि का नाटक करेंगे। अपने-अपने को प्रभाष जी का चेला साबित करने की होड़ होगी।

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विस्मयकारी है आलोक मेहता का कथन

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एसएन विनोद: पत्रकारिता नहीं, पत्रकार बिक रहे-3 : नई दुनिया के आलोक मेहता की आशावादिता और दैनिक भास्कर के श्रवण गर्ग का सवाल चिन्हित किया जाना आवश्यक है। आलोक मेहता का यह कथन कि ''पेड न्यूज कोई नई बात नहीं है, लेकिन इससे दुनिया नष्ट नहीं हो जाएगी'', युवा पत्रकारों के लिए शोध का विषय है। निराशाजनक है। उन्हें तो यह बताया गया है और वे देख भी रहे हैं कि 'पेड न्यूज' की शुरुआत नई है।

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