हिंदी पत्रकारिता का नया चेहरा : हिंदी पत्रकारिता का मतलब भले ही कागजों में न बदला हो लेकिन व्यवहार में इसका चेहरा बदल गया है. इसकी अगुआई की है इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने. यह पत्रकारिता से ज्यादा फिल्म बनाने का जरिया बन गया है. हाल ही में इसी विषय पर 'रण' नामक जो फिल्म आई है, उसने यह बात लगभग प्रमाणित कर दी है कि खबरें कैसे बनाई जाती हैं. कुछ अतिशयोक्तियों को नजरंदाज करें तो इस फिल्म में अनेक महत्वपूर्ण बातें उठाई गई हैं. उनमें से एक यह कि पहले मीडिया का काम था कि जो घटना हो गई है या जिसे होने की संभावना है, उसे दिखाया जाय। अब मीडिया का काम हो गया है जबरन किसी बात को घटना बताना और उसकी रिपोर्टिंग करना. कई बार तो इलेक्ट्रानिक मीडिया अपने तकनीक से घटना को गढ़ता है और उसे ऐसे दिखाता है जैसे कोई तूफान आ गया हो.
इस समय मीडिया का रोल कई बार इतना संशय वाला हो जाता है कि लगता है कि वह किसी नेता को चमकाने के लिए ही रह गया है. लालू यादव ने कैसे मीडिया मैनेज किया था, सभी जानते हैं. अब राहुल गांधी के लिए पूरा मीडिया उनकी ऐसी छवि बनाने में जुट गया है जैसे एक अकेले राहुल ही देश की दिशा बदल सकते हैं. पर क्या यह सच नहीं कि केवल एक दिन की ड्रामेबाजी से देश नहीं बदलता. बाल ठाकरे, राज ठाकरे और सामना की चर्चा अगर नेशनल मीडिया न करे तो दो दिन में उनकी राजनीति हवा हो जाय. पर मीडिया को यह लिखने में मजा आता है कि ठाकरे की मांद में घुसकर सीना तानकर लौट आए राहुल.
पूरे मीडिया जगत को यह भरोसा हो चला है कि पाठक और दर्शक केवल अपराध ही देखते पढ़ते हैं. हिंदी पत्रकारिता का भी नया चेहरा कमोबेश ऐसा ही बन गया है. इस नए चेहरे को बनाने में मीडिया के एक बड़े समूह के हिंदी अखबार ने अग्रणी भूमिका अदा की है. लेकिन उसकी कार्यप्रणाली को हिंदी के दूसरे छोटे अखबारों ने नहीं समझा. उस बड़े अखबार ने देश भर में सबसे पहले अपनी लोकप्रियता बढ़ाई. देश भर में सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले अखबारों में दूसरों के साथ उसका नाम बना तब उसने एक नया रास्ता बनाया.
दूसरे अखबार आते ही उसकी नकल करने में लग जाते हैं. इससे वे अपना पाठक वर्ग तो नहीं ही पैदा कर पाते हैं, किसी बड़े अखबार का पाठक भी नहीं तोड़ पाते. बाद में पाठकों के बाजार में वे धीरे धीरे लुप्त होते जाते हैं. इस व्यावहारिक सच्चाई को न तो अखबार का मालिक समझ पाता है, न ही संपादक. और आगे चलकर अखबार को बंद करने की हालत हो जाती है.
यह सच है कि किसी भी अखबार के जीवन के लिए पाठक कोई बड़ा प्रभावशाली काम नहीं करता, अखबार केवल विज्ञापन के जोर पर ही चलता है. लेकिन पाठक वर्ग के कारण समाज के हिस्से में अखबार की एक इमेज जरूर बनती है. और यह इमेज ही अगर घटियापन की ओर ले जाने का रास्ता दिखाने लगे तो विज्ञापन देने वाला भी सौ बार सोचता है. इसलिए किसी भी अखबार को सबसे पहले आम पाठकों के लिए स्वीकार्य बनाया जाना चाहिए. उसे हर स्टॉल पर दिखना भी चाहिए. विज्ञापनों के लिए घूमने वाला प्रतिनिधि इसी इमेज को लेकर व्यापारियों के यहां जाता है. इतनी-सी मौलिक बात अगर नए पैदा होने वाले अखबारों के मालिक नहीं समझ पाते और उनका प्रहार गंभीर बातें करने वालों पर ही होने लगता है तो उसे बाजार में असफल होना तय है.
छोटे-मोटे अखबारों में खासतौर से यह बात ज्यादा ही महसूस की जा रही है. असल में इनमें से ज्यादातर हिंदी अखबारों के लोग यह दलील देते हैं कि अंग्रेजी अखबारों ने जो ट्रेंड बना दिया है उसे ही अपनाना चाहिए. इसके लिए वे यहां तक कहते हैं कि अंग्रेजी अखबारों के संचालकों ने यह भी सिखाया है कि हिंदी में पाठकों को जोडऩे के लिए जमकर सेक्स और अपराध को छापो. एक मित्र कहते हैं कि वे अंग्रेजी माध्यम से पढ़कर बड़े हुए हैं इसलिए उन्हें केवल अंग्रेजी ही पसंद हैं. यह और बात है कि वे खुद एक छोटे से हिंदी अखबार में ही काम करते हैं और सरकारी अधिकारियों और प्रिय मित्रों से कहते हैं कि वे फलां अखबार में फलाने बड़े पद पर आ गए हैं. एक दिन उनके एक मित्र ने टोक दिया- भैया, तुम अंग्रेजी के इतने गुण गाते हो, वहां जाने का प्रयास क्यों नहीं करते? बोले- वे लेते ही नहीं. उनका दावा है कि हिंदी के ज्यादातर पाठक संपादकीय पेज नहीं पढ़ते इसलिए उसे बंद कर देना चाहिए.
उन जैसे ही एक दूसरे पत्रकार मित्र ने संपादकीय की दैनिक बैठक में कहा कि उनका वश चले तो अखबारों से न केवल संपादकीय पेज बंद कर दूं बल्कि पालिटिकल ब्यूरो ही बंद कर दूं, कौन पढ़ता है राजनैतिक खबर? इसमें पेज और मालिक का पैसा और समय बर्बाद होता है. वे इस बयान को अक्सर दोहराते रहते हैं. एक दिन मालिक को लगा कि बात तो यह बंदा ठीक कहता है. अगर ऐसा कर दिया जाय तो अखबार के खर्चे में हजारों रुपए की बचत भी हो सकती है. ठीक भी है, जब एजेंसी से ही काम चल सकता है तो दूसरे रिपोर्टरों और ब्यूरो पर पैसे खर्च करने का औचित्य क्या है. लिहाजा फैसला ले लिया गया. लोगों ने उन्हें बधाई दी. मालिक ने आपका कहा मान लिया. पर क्या इससे अखबार का भला हो पाएगा? क्या अखबार छिछोरे व सस्ती खबरों से अपनी पहचान बनाने में सफल हो सकेगा?
लेखक अंचल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं.

written by एस.के.सुमन, March 02, 2010
written by एस. के. सुमन, March 02, 2010
written by Rajni Kant Mudgal, March 02, 2010
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