अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) का ज़िक्र होते ही मुझे कुरार गाँव की औरतों का ध्यान आता है। मुम्बई के उपनगर मालाड (पूर्व) में ईस्टर्न हायवे से सटी हुई विशाल बस्ती का नाम है ‘कुरार गाँव’। दूर तक इस बस्ती के सिर पर बस सीमेंट की छतें नज़र आती हैं। बीस साल पहले जब मैंने वहाँ एक चाल में अपना रैन बसेरा बनाया था तो यहाँ छ: पार्षद थे यानी लगभग 6 लाख की आबादी थी। बहुत कुछ बदला मगर न तो ‘कुरार गाँव की औरतें’ बदलीं और न ही उनकी ज़िंदगी बदली। उनका सोच-विचार और व्यवहार आज भी वैसा ही है। मुझे उस समय किंचित आश्चर्य हुआ था कि मेरे पड़ोसी टिम्बर मर्चेंट कासिम की बीवी ही नहीं जवान बेटी भी अनपढ़ है। सर पर डिब्बा लादकर इडली बेचने वाले अन्ना की पत्नी अनपढ़ है तो सिक्योरिटी गार्ड तिवारी की पत्नी भी अनपढ़ है। कुल मिलाकर उस गांव में अनपढ़ औरतों की संख्या काफी थी।
जब मैं अपने बीवी-बच्चों के साथ उनकी दुनिया में दाखिल हो गया तो मैंने उन पर एक कविता लिखी-‘कुरार गाँव की औरतें’। उस समय मुम्बई में राहुलदेव के सम्पादन में ‘जनसत्ता’ लोकप्रियता के शिखर पर था। नगर पत्रिका ‘जनसत्ता सबरंग’ के सम्पादन के लिए कथाकार धीरेंद्र अस्थाना दिल्ली से मुम्बई आ चुके थे। लोकल ट्रेन के सफ़र में मैंने यह कविता उन्हें पढ़ने के लिए दी। उन्होंने कहा- मैं इसे छापूंगा। रविवार 20 मार्च 1990 को जब ‘जनसत्ता सबरंग’ में यह कविता प्रकाशित हुई तो मुम्बई के साहित्य जगत में धूम मच गई।
सबसे पहले मुम्बई में समकालीन कविता के बहुचर्चित कवि विजय कुमार ने फोन पर बधाई दी। ‘धर्मयुग’ और ‘नवभारत टाइम्स’ के मित्रों ने तारीफ़ की। विनोद तिवारी के सम्पादन में हिंदी की सबसे सुरुचिपूर्ण फ़िल्म पत्रिका ‘माधुरी’ हिंदी की ‘फ़िल्मफेयर’ बन गई थी, उसमें कार्यरत पत्रकार मिथिलेश सिन्हा ने कहा- मैंने अपनी अब तक की ज़िंदगी में कभी अतुकांत कविता नहीं पढ़ी। मगर इसका शीर्षक देखकर मैं ख़ुद को पढ़ने से रोक नहीं पाया। मुझे यह कविता बहुत अच्छी लगी। मुम्बई के साहित्य जगत में टीका-टिप्पणी का भी दौर चला। किसी ने कहा कि यह तो बाबा नागार्जुन की एक कविता की नक़ल है तो किसी ने कहा कि यह तो आलोक धन्वा की ‘ब्रूनों की बेटियों’ से प्रभावित है। कुल मिलाकर यह कविता इतनी लोकप्रिय हुई कि कई लोग मुझे ‘कुरार गाँव का कवि’ कहने लगे।
सबसे दिलचस्प बात यह हुई कि सुबह 10 बजे क़रीब 20 अनपढ़ औरतों का एक समूह मेरे पड़ोस में रहने वाली एक स्कूल शिक्षिका के पास गया। उन्होंने उसके सामने ‘जनसत्ता सबरंग’ रखकर कहा कि बताओ- इसमें हमारे बारे में छपा क्या है? स्कूल शिक्षिका ने उनके सामने पूरी कविता का पाठ किया। कुरार गाँव की औरतों ने कहा- हमारे बारे में जो भी छपा है वह सच है। एक कवि के लिए इससे बड़ा प्रमाणपत्र क्या हो सकता है! शाम को कई लोग मिलने आए। उनमें एक बंगाली व्यवसायी थे आनंदजी। उन्होंने मुझे एक चाभी सौंपते हुए कहा- मैंने दो निजी शौचालय बनवाए हैं। उनमें से एक आपका हुआ। अब आप सरकारी शौचालय की लाइन में नहीं खड़े होंगे। एक कविता के लिए इससे बड़ा पुरस्कार और क्या हो सकता है !
6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या काण्ड की प्रतिक्रिया में मुम्बई में दंगे शुरू हो गए। सम्पादक राहुलदेव जी ने सुझाव दिया कि साम्प्रदायिक सदभावना का
संदेश जनसत्ता के पाठकों तक पहुँचाने के लिए मैं कुछ बुद्धिजीवियों से बात कर लूँ। मैंने सबसे पहले डॉ.धर्मवीर भारती को फोन किया। वे लाइन पर आए तो मैंने कहा - सर मेरा नाम देवमणि पाण्डेय है। वे तपाक से बोले- अरे भाई मैं तुम्हें जानता हूँ। तुम्हारी वो कविता मैंने पढ़ी थी- ‘कुरार गाँव की औरतें’। बहुत अच्छी लगी। मैं चाहता हूँ कि तुम एक दिन मेरे घर आओ और मुझे अपनी कविताएं सुनाओ। मैं एक दिन भारती जी के घर गया। उन्होंने बड़े प्रेम से मेरी कविताएं सुनीं।
आज भारती जी हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन ‘कुरार गाँव की औरतों’ का असर कुछ ऐसा है कि आज भी मेरे सर पर श्रीमती पुष्पा भारती का वरदहस्त है। आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) पर मुझे कुरार गाँव की औरतों की बहुत याद आ रही है। आइए आपको भी इन औरतों से मिलाएं....
कुरार गाँव की औरतें
(1)
कुरार गाँव की औरतें ऑफिस नहीं जातीं
वे ऑफिस गए पतियों और
स्कूल गए बच्चों का करती हैं इंतज़ार
बतियाती हैं अड़ोस पड़ोस की औरतों से
या खोल देती हैं कोई क़िस्सा कहानी
उनके क़िस्सों में ज़्यादातर होती हैं औरतें
कि किस औरत का भारी है पैर
कौन पिटती है पति से
या कौन लड़ती है किससे
वे इस बात में रखती हैं काफ़ी दिलचस्पी
कि कल किसकी बेटी
बाहर से कितनी लेट आई
और किस लड़की ने
अपने माँ बाप की डाँट खाई
खाना - पानी, कपड़े - बच्चे
सिलाई - कढ़ाई - लड़ाई
और न जाने कितने कामों के बावजूद
किसी ख़ालीपन का एहसास
भर जाता है उनमें
बेचैनी, ऊब और झल्लाहट
और वे बुदबुदाती हैं
समय की सुस्त रफ़्तार के खिलाफ़
(2)
कुरार गाँव की औरतें
टीवी पर राम और सीता को देखकर
झुकाती हैं शीश
कृष्ण की लीलाएं देखकर
हो जाती हैं धन्य
और परदे पर झगड़ने वाली औरत को
बड़ी आसानी से समझ लेती हैं बुरी औरत
वे पुस्तकें नहीं पढ़तीं
वे अख़बार नहीं पढ़तीं
लेकिन चाहती हैं जानना
कि उनमें छपा क्या है !
घर से भागी हुई लड़की के लिए
ग़ायब हुए बच्चे के लिए
या स्टोव से जली हुई गृहणी के लिए
वे बराबर जताती हैं अफ़सोस
उनकी गली ही उनकी दुनिया है
जहाँ हँसते-बोलते, लड़ते-झगड़ते
साल दर साल गुज़रते चले जाते हैं
और वक़्त बड़ी जल्दी
घोल देता है उनके बालों में चाँदी
(3)
कुरार गाँव की औरतें
अच्छी तरह जानती हैं कि
किस वर्ष बरसात से
उनकी गली में बाढ़ आई
किसके बेटे-बेटियों ने शादी रचाई
किस औरत को
कब कौन सा बच्चा हुआ
और कब कौन उनकी गली छोड़कर
कहीं और चला गया
लेकिन उन्हें नहीं पता कि तब से
यह शहर कितना बदल गया
कब कौन सा फैशन आया और चला गया
और अब तक समय
उनकी कितनी उम्र निगल गया
अपनी छोटी दुनिया में
छोटी झोंपड़ी और छोटी गली में
कितनी ख़ुश -
कितनी संतुष्ट हैं औरतें
सचमुच महानगर के लिए
चुनौती हैं ये औरतें
(4)
कुरार गाँव की औरतें
तेज़ धूप में अक्सर
पसीने से लथपथ
खड़ी रहती हैं राशन की लाइनों में
देर रात गए उनींदी आँखों से
करती हैं पतियों का इंतज़ार
मनाती हैं मनौतियां
रखती हैं व्रत उपवास
और कितनी ख़ुश हो जाती हैं
एक सस्ती सी साड़ी पाकर
भूल जाती हैं सारी शिकायतें
वे इस क़दर आदतों में हो गईं हैं शुमार
कि लोग भूल गए हैं
वे कुछ कहना चाहती हैं
बांटना चाहती हैं अपना सुख-दुख
देर रात को अक्सर
दरवाज़े पर देते हुए दस्तक
सहम उठते हैं हाथ
किसी दिन अगर
औरतों ने तोड़ दी अपनी चुप्पी
तो कितना मुश्किल हो जाएगा
इस महानगर में जीना.

| < Prev | Next > |
|---|







-देवमणि पाण्डेय