मीडिया वालों को क्या समझते हैं ये अफसर? : सोमवार आठ मार्च का दिन दक्षिण बस्तर के लिए शर्मनाक रहा। एक बड़े जनहितकारी आयोजन के लिए नियुक्त प्रशासनिक अफसरों ने पहले तो उन करतूतों पर पर्दा डालने की कोशिश की जिससे गरीब आदिवासियों को ज्यादा नुकसान पहुंच सकता था और बाद में वे इस मामले के खुलासे को लेकर मीडिया से ही उलझ गए। दंतेवाड़ा में एनएमडीसी के सहयोग से मेगा नेत्र शिविर का आयोजन किया जा रहा है। इसमें बड़ी संख्या में आदिवासी मोतियाबिंद पीडि़त अपनी आंखों की रोशनी पाने की चाहत में पहुंचे। दोपहर में दंतेवाड़ा की मीडिया टीम ने देखा कि हास्पिटल में एक्सपायरी डेट की दवाएं मरीजों के लिए रखी गई हैं। मीडिया ने इसकी तस्वीरें ले लीं।
यह खबर लगते ही आयोजन के संयोजक और जिला पंचायत सीईओ आईएएस पी दयानंद सीधे मीडिया से उलझ गए। पहले अपने साथी एसडीएम के साथ मीडियाकर्मियों के साथ धक्का मुक्की की। उसके बाद 'बे, साले' जैसे असंसदीय भाषा का प्रयोग करते हुए हुज्जत भी करने लगे। एक पत्रकार को तो उन्होंने यहां तक कह दिया कि इन 'चुतियों' को यहां से भगाओ। मरीजों को गलत दवा दिए जाने के मामले में कार्रवाई करने की जगह इन अफसरों का मीडिया से उलझना उनकी अच्छी मानसिकता को कतई प्रदर्शित नहीं करता। दक्षिण बस्तर अतिसंवेदनशील नक्सल प्रभावित जिला है यहां के अफसरों से ऐसी अमानुसिक हरकतों की कल्पना में भी अपेक्षा नहीं की जा सकती। पर बददिमाग और बदतमीज़ हो चुके प्रशासन के इन अफसरों पर शासन का कोई नियंत्रण नहीं दिख रहा। हो सकता है उन्हें इन शब्दों से तकलीफ पहुंचे इसलिए यह बताना जरूरी है कि बदतमीज का मतलब जिसके पास तमीज न होना और बद्जुबां का मतलब जिसकी भाषा असंसदीय हो।
इस जिले में आने वाले आईएएस अफसर अगर यह सोच रहे हैं कि यहां अनपढ़ लोग रहते हैं तो वे अपनी शिक्षा दिखाकर अपनी मूर्खता का सार्वजनिक प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं? अगर वे समझते हैं कि यहां के लोग भी ज्यादा न सही पर थोड़े पढ़े-लिखे हैं तो वे अपनी शिक्षा और परिवार से मिले संस्कार को कचरे के डिब्बे में डालने का काम क्यों कर रहे हैं? जिले में एक महिला कलेक्टर हैं। वे छह माह के भीतर चार बार अपने आईएएस साथियों की गलतियों के कारण सार्वजनिक तौर पर माफी मांग चुकी हैं। रही बात पी दयानंद की तो यह बताना लाजिमी है कि वे एक ऐसे अफसर हैं जिन्हें अपने सरकारी बंगले पर आफ दी रिकार्ड में करीबन आठ लाख रुपए खर्च किए हैं। इस कार्य का न तो अब तक स्टीमेट बना है और न ही उसकी सरकारी स्वीकृति ली गई है। आम जन यह जानकर चकित हो सकते हैं कि बंगले के भीतर जनाब ने एक तीन लखा झोपड़ा भी तनवाया है। और न जाने क्या-क्या किया गया है।
यह जानकारी आरईएस विभाग के अफसरों ने ही दी है। दूसरे अफसर अपने माथे पर हाथ रखकर बैठे हैं कि बंगले में खर्च की गई राशि को किस मद से किस आधार पर निकालें। अगर ये जनाब बेहद संजीदा और ईमानदार किस्म के हैं तो उन्हें इस संवेदनशील जिले के ऐसे सरकारी भवन में फिजूल के खर्च से बचना चाहिए था। रही बात शर्मनाक घटना के लिए तो इसके लिए क्या सज़ा और क्या माफी? इस क्षेत्र में आईएएस अफसरों की पदस्थापना के लिए स्थानीय लोगों ने ही मांग उठाई थी। अंतत: सरकार ने मर्म को समझा और इसकी शुरुआत की।
पहली, दूसरी खेप तक सब कुछ ठीक रहा। अब जो खेप यहां पहुंची है वह भले ही युवा है पर लगता है इनमें सहजता, सरलता और सहृदयता का नितांत अभाव है। गीदम नगर पंचायत के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने ऐसे ही बद्दिमाग अफसर के कारण उनकी मौजूदगी में शपथ लेने तक से इंकार कर दिया।
किसी अफसर के लिए इससे बुरी बात क्या हो सकती है? पर अपनी ढिंगा मस्ती में चूर यह अफसरशाही दक्षिण बस्तर के लिए नक्सलवाद से ज्यादा गंभीर समस्या बनती नजर आ रही है। यह बात सरकार को समझनी चाहिए और कम से कम ऐसे अफसरों को समय रहते सबक देने में किसी प्रकार की कोताही नहीं बरतनी चाहिए।
लेखक सुरेश महापात्र बस्तर के वरिष्ठ पत्रकार हैं और 'बस्तर इंपैक्ट' के संपादक हैं.

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दंतेवाड़ा हर मामलो में स्वर्ग से कम नहीं है चाहे वो अफसर हो या पत्रकार यहाँ बिना पत्र वालों के पास भी देखते देखते कार आ जाती है. फिर तो उलझने वाले पत्रकार हैं. सलवा जुडूम कैंप में चार आने का डिस्पोजल ग्लास आठ दस रुपये में सप्लाई हो सकता है उनके नाम आया केरोसिन व राशन दलालों के जरिये दुकानों तक पहुँचता रहा तो कोई आवाज नहीं उठाता.जब तक सेटिंग से काम चला सब ठीक है. नहीं तो विरोध शुरू. पिछले दिनों जगदलपुर में भी कुछ पत्रकार नेताओं ने टाटा की दलाली की यह बात भी जगजाहिर हो चुकी है. पूरे बस्तर में अफसर पत्रकारों को अपनी ऊँगली पर नाचतें रहे हैं सबके अपने अपने धंधे हैं दंतेवाड़ा भी इससे अछूता नहीं है.
पिछले दिनों मानवाधिकार वाले कुछ लोग दंतेवाड़ा आये थे, मेहमाननवाजी करने के बजाय पत्रकार ही उनसे उलझ गए. धरना भी दिया चक्काजाम भी किये. जबकि पत्रकारों को पार्टी बनने की जगह निष्पक्षता से समाचार बनाना था फैसला पाठक करते. वहां उस दिन भी पत्रकार यूज होते रहे.
पत्रकारों को दंतेवाड़ा में सरकारी दफ्तरों में प्रतिबंधित किये जाने की बातें सामने आ रही है. डेमोक्रेसी में एक आम नागरिक बॉस है और हमारे पैसे से वेतन पाने वाले ये सरकारी अफसर हमारे नौकर. लेकिन बिडम्बना है की बॉस को अपने नौकर से मिलने के लिए परमिसन लेना पड़ता है. इस परिपाटी को तोड़ सकें तभी दयानंद जैसे अफसरों की आकार ठिकाने आ सकती है.
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