: भाग 28 : दिवाली के बाद पहली बार छुट्टी लेकर मेरठ आया हूं। अपने पापा को देखने के लिए। उनकी तबियत जरा खराब चल रही थी। चैकअप में चिन्ता की कोई बात नहीं मिली। सुकून मिला। फिर मैं चल पड़ा नौनिहाल के घर की ओर। दिसंबर में सुधा भाभी को पैरेलिटिक अटैक होने के बाद उनके बच्चों से फोन पर बात होती रही थी। दो बार भाभीजी से भी बात हुई थी। फोन पर उन्होंने पहचान लिया था। मुझे लगा था कि वे बहुत ठीक हो चुकी हैं।
शास्त्री नगर के पास जागृति विहार के तीसरे सैक्टर में उनके घर के सामने खड़ा हूं। बहुत कुछ बदला-बदला सा लगता है। छोटा सा घर। लगभग सड़क पर ही दरवाजा। बाहर के कमरे में ही भाभीजी लेटी हुई हैं। बड़ा बेटा मधुरेश दरवाजा खोलता है। मैं अपने छोटे भाई अरुण के साथ अन्दर दाखिल होता हूं। नमस्ते करके भाभीजी से पूछता हूं, ‘पहचाना क्या?’ वे थोड़ा तिरछी होकर हमें देखती हैं। मुझे नहीं पहचान पातीं। शायद मेरा नाम उन्हें याद नहीं आता। लेकिन आश्चर्य की बात, अरुण को पहचान लेती हैं। कहती हैं, ‘ये तो अरुण त्यागी हैं।’ (मेरे मुबई जाने के बाद अरुण का ही उनके घर ज्यादा आना-जाना रहा।) मधुरेश मेरी ओर इशारा करके बोलता है, ‘और ये?’ वे कहती हैं, ‘अरुण के बड़े भाई।’ मुझे राहत मिलती है कि वे पहचान तो रही हैं पर उन्हें मेरा नाम याद नहीं आ रहा था।
नौनिहाल की बड़ी बहन हरदम सुधा भाभी के साथ ही रहती हैं। उनका पूरा ख्याल रखती हैं। बच्चों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। मधुरेश पुरानी यादों में डूब जाता है। तीनों बच्चों में केवल उसे ही नौनिहाल की बहुत सारी बातें याद हैं। वास्तव में नौनिहाल ने मधुरेश को भी बहुत कम उम्र में ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी थी। उसे वे बहुत से काम सिखाने लगे थे। मधुरेश एक पुरानी सी फाईल ले आता हैं। उसमें कई कागजात हैं। उनके बीच से एक पोस्ट कार्ड निकलता है। सामने का हिस्सा बहुत बारीक लिखावट से पूरी तरह भरा हुआ। पते वाली तरफ करीब 1 ईंच जगह खाली। मुझे यह तो मालूम था कि नौनिहाल पोस्ट कार्ड पर सबसे ज्यादा शब्द लिखने का रिकार्ड बनाने में लगे थे, पर ये पता नहीं था कि अपनी इस धुन में वे इतना ज्यादा काम कर चुके थे। लिखावट इतनी बारीक है कि मुझे तो कुछ भी समझ नहीं आता। पर मधुरेश उसे पढ़ लेता है। वह सुनाता है, ‘पाठको, यूं तो आपने हजारों कहानियां सुनी होंगी। सुनाने के लिए एक से एक किस्सागो मिले होंगे। उनमें अपने लहू से लिखने वाले भी रहे होंगे. . .’
इतना पढ़ने से बाद मधुरेश ने अमर गोस्वामी की 11 कहानियों का संकलन ‘उदास राघोदास’ निकालकर दिखाया। वह ये बताकर अचरज में डाल देता है कि 112 पेज की इस किताब के लगभग 100 पेज पापा ने से पोस्ट कार्ड पर लिख लिए थे। बाकी बची एक इंच जगह में 12 पेज भी लिखकर वे इस पोस्ट कार्ड पर पूरी किताब उतार देते। अक्टूबर, 1992 में मु्जफ्फरनगर के आलोक गुप्ता ने एक पोस्ट कार्ड पर 22 हजार 761 शब्द लिखकर लिंमका बुक आॅफ रिकाॅड्र्स में अपना नाम शामिल कराया था। नौनिहाल इस पोस्ट कार्ड पर उससे ज्यादा शब्द लिख चुके थे। चूंकि अभी एक इंच जगह और बची थी, इसलिए वे गिनीज आॅफ वल्र्ड रिकाड्र्स में अपना नाम शामिल कराना चाहते थे। लेकिन उनका ये काम अधूरा रह गया. . .
हम सब गमगीन हो उठे हैं। अचानक सुधा भाभी सुबकने लगती हैं। शायद वे अपनी यादों में चली गयी हैं। और यादें आंसुओं में बदल जाती हैं। अरुण मुझे इशारा करता है कि पुरानी बातें इनके सामने मत दोहराओ। नौनिहाल की बहन सुधा भाभी को बैठा देती हैं। उन्हें दायीं ओर पैरेलिसिस है। बायीं ओर का हिस्सा ठीक है। पर अब वे अटैक से काफी हद तक उबर चुकी हैं। यहां तक कि दायें हाथ को भी थोड़ा ऊपर-नीचे कर लेतीं हैं। मगर न जाने क्यों उन्हें लगता रहता है कि अपनी सारी जिम्मेदारियां उन्हें जल्दी पूरी कर लेनी चाहिएं। इसीलिए मधुरेश का रिश्ता कर दिया है। सर्दियों में उसकी शादी है। मधुरेश खुश भी है और उदास भी। 28 साल का हो गया है। अभी तक नौकरी नहीं मिली। ट्यूशन पढ़ाकर किसी तरह अपनी जिम्मेदारियां निभाने की कोशिश कर रहा है। चाहता था कि अच्छी तरह सैटिल होने की बाद ही शादी करें। पर भाभीजी की इच्छा के सामने उसे झुकना पड़ता हैं।
हमेशा शान्त और संयत रहने वाले मधुरेश की आवाज में धीरे-धीरे थोड़ी तुर्शी आने लगती है- इतने दोस्त थे पापा के। एक-दो को छोड़कर किसी ने कोई सुध नहीं ली। कई के पास तो मैं खुद गया। कई को फोन किया। किसी ने मदद नहीं की। ऐसे में तो गैर भी काम आ जाते हैं, इन सबको तो फिर भी हम अपना ही समझते थे।
मधुरेश की आवाज में नमी आ जाती है। सहसा मुझे ख्याल आता है, कोई आधा दर्जन तो आज ऐसे आरई ही हैं, जिनसे नौनिहाल की खासी नजदीकी रही थी। वे चाहते तो मधुरेश को खुद नौकरी दे सकते थे या उसे कहीं नौकरी दिला सकते थे। लेकिन ये दूसरा वक्त है, वो दूसरा वक्त था। तब नौनिहाल मुफलिसी में भी दूसरों के लिए अपनी बाहें और दिल खुले रखते थे। आज लोग बेहद अच्छी स्थिति में होने के बावजूद बाहंे और दिल, दोनों बंद रखते हैं। सबको केवल अपना ही हित दिखता है। दूसरों की किसी को कोई परवाह नहीं है।
नौनिहाल का छोटा बेटा प्रतीक और बेटी ज्योति भी आकर बैठ जाते हैं। प्रतीक बीआईटी से मैकेनिकल में बीटैक कर रहा है। फाइनल ईयर में है। एनटीपीसी में इन्टर्नशिप कर चुका है। एनटीपीसी, भेल और रेलवे में से कहीं नौकरी करना चाहता है। मैं उसे डीआरडीओ या इसरो के लिए तैयारी करने को कहता हूं। उसे थोड़ी हिचक है, ‘मेरी अंग्रेजी बहुत अच्छी नहीं है।’
‘तो क्या हुआ? अभी एक साल है। उसकी तैयारी की जा सकती है। ये कोई बड़ी समस्या नहीं है।’
वह सहमति में सिर हिलाता है।
ज्योति डीएन कालेज से बीएससी कर रही है। पीसीएम की फाईनल ईयर की स्टूडेंट है। मैथ्स में एमएससी करके लैक्चरर बनना चाहती है। इसके लिए एमएससी के बाद एमफिल, पीएचडी और नैट क्वालीफाई करना होगा। यानी कम से कम आठ साल की मेहनत और। उसे मैथ्स के बजाय एनवायरमेन्टल साइंस में एमएससी करने की सलाह देता हूं। इसका स्कोप वह तुरन्त समझ जाती है। हालांकि इसमें उसे ज्यादा मेहनत लगेगी, लेकिन अच्छा स्कोप देखकर वह मेहनत करने को तैयार हो जाती है।
प्रतीक और ज्योति को अपने पापा की ज्यादा याद नहीं है। उन्होंने अपनी मां और बड़े भाई से काफी सुना है। दूसरों से भी। उसी के आधार पर उनके दिमाग में एक छवि है कि उनके पिता एक जीनियस थे। उन्हें इसका अहसास है कि पिता के न रहने और मां के बीमार होने के कारण उन पर बड़ी जिम्मेदारी आ पड़ी है। फिर भी वे पूरी शिद्दत से जिन्दगी से जूझ रहे हैं। उनके कुछ गिले-शिकवे हैं। कुछ शिकायतें हैं। कुछ कड़वाहट भी उनके मन में है। इस सब के बावजूद उन्हें गर्व इस बात का है कि नौनिहाल उनके पिता थे और बहुत से लोग मानते हैं कि वे एक अच्छे और सच्चे पत्रकार थे।
नौनिहाल की यादों में डूबते-उतराते हमें करीब एक घंटा हो चला है। बैठे-बैठे भाभीजी थकने लगती हैं। हम उन्हें लेटने को
कहकर विदा लेते हैं। वे कुछ उदास सी हैं। बाहर शाम भी उदास है। मधुरेश, प्रतीक और ज्योति हमें छोड़ने बाहर तक आते हैं। मधुरेश अपनी शादी में आने का आग्रह दोहराता है। अब हम उनसे विदा ले रहे हैं। अचानक मधुरेश बोलता है, ‘पोस्ट कार्ड पर विश्व रिकार्ड लिखने का पापा का अधूरा काम मैं जरूर पूरा करूंगा!’
उसकी आवाज में दृढ़ता है। हौसले में मानो पंख लगे हैं। उसकी ये जिद बिल्कुल नौनिहाल जैसी है।
लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.

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Toh apne ko kisi se kam na samjho..,
jai hind jai bharat