Category: इवेंट, पावर-पुलिस, न्यूज-व्यूज, चर्चा-चिट्ठी... Published Date Written by आलोक कुमार
: मोदी-आडवाणी के मनभेद के निहितार्थ : नरेन्द्र मोदी ने लालकृष्ण आडवाणी से मतभेद से इनकार किया है। मोदी के इनकार की सच्चाई किसी से छिपी नहीं है। सब जानते हैं चौरस पर बिसात बिछ गई है। बीजेपी के दो धाराओं में फिर से सियासी जंग शुरू हो गया है। खुलकर तलवारबाजी हो रही है। बस अब इंतजार जंग के अंजाम तक लहुलुहान होने वाले सियासत दानों की गिनती करने का है। गुजरात में आडवाणी के जनचेतना रथ यात्रा के पहले दिन वापी के सभामंच का दृष्टांत को मोदी की कोई भी सफाई झुठला नहीं सकती। नजरों से दिखे सच को जुबानी सफाई से भला कैसे झुठलाया जा सकता है।
बीजेपी के दोनों शख्सियतों के बीच का मतभेद ही नहीं मनभेद तक पैदा हो गया है। सब जानते हैं कि कुर्सी के दरम्यान का दिखा फासला महज टीआरपी के लिए नहीं था। अब फासले के रफू को लेकर संघ के नेता चिंतित हैं। बड़ी होशियारी से दिग्गजों के फासले को पवित्र अंदाज में पेश करने का इंतजाम हो रहा है। लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी के शुरुआती रिश्ते के हवाले से कुछ दलील पेश की जा रही है। मकसद मोदी-आडवाणी के विवाद को प्रमाणिक तरीके से बनावटी साबित करना है। एक दिलचस्प कहानी तैयार है जिसे हर रहगुजर को सुनाया जा रहा है।
कहानी कुछ इस तरह है-लालकृष्ण आडवाणी के राजनीति सफर की शुरुआत अटल बिहारी वाजपेयी के पीए के तौर पर हुई। फिल्मों पर लिखने वाले कलमकार व पत्रकार आडवाणी साठ के दशक में साथ-साथ फिल्म देखते-देखते वाजपेयी के पीए बन गए। कहा जा रहा है कि अपने साहब यानी अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता तय कराने के लिए ही पीए लालकृष्ण आडवाणी ने आगे चलकर कट्टर हिंदू नेता की छवि अख्तियार कर ली। वरना आडवाणी के मन में पहले से ही कांग्रेस की तुलना में मोहम्मद अली जिन्ना को देश के बंटवारे के लिए कम कसूरवार मानने का भाव था। आडवाणी के उग्र हिंदूत्व वाली छवि ग्रहण करने का मकसद पारिभाषिक तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी को मुलायम छवि का गैर संप्रदायिक व्यक्तित्व साबित करना था।
इसमें आडवाणी के परित्याग से तब की जनसंघ और अब की बीजेपी सफल रही। आडवाणी के कट्टर छवि के इजहार और वाजपेयी की तरफ से उसकी काट ने बीजेपी को समझने के लिए होशियारी से दो मानक तय कर दिए। आगे चलकर बेहतर नतीजे सामने आए और अटल बिहारी वाजपेयी की छवि सर्वग्राही बन गई। बीजेपी के लिए प्रधानमंत्री की कुर्सी हासिल करने के सफर को आसान बना गया। वाजपेयी को सामने रखकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का गठन मुमकिन हुआ। कठमुल्लावादी राजनीति करने में कांग्रेस का कम्पटीशन कर रहे समाजवादियों को राजग में शामिल होने में दिक्कत नहीं आई। मुलायम सिंह यादव तक वाजपेयी के प्रशंसक बन गए। वाजपेयी आसरे राम मंदिर आंदोलन की सूत्रधार बीजेपी गैर संप्रदायिक हो गई।
यह कहानी दोहरा कर सुनाकर संघ बिगड़ी संवारने की कोशिश में लगा है। एकबार फिर बनावटी इतिहास का सहारा ले रहा है। इतिहास के हवाले से बताया जा रहा है कि इस बार नरेन्द्र मोदी ने अपने आका आडवाणी की बिगड़ी संवारने के लिए त्याग कर रहे हैं। मोदी ने कट्टर हिंदूत्व की छवि ग्रहण कर ली है। कथित तौर पर प्रधानमंत्री बनने की दावेदारी पेश करने के लिए मोदी ने सद्भावना यात्रा की। खुद को आडवाणी का प्रतिद्वंदी घोषित कर दिया। कथित सद्भाव के दौरान मोदी ने अपने घोर हिंदुवाद की लकीर को और गाढ़ी स्याही से रंगने का काम किया है। मोदी को सिर पर मुल्ला टोपी रखना गंवारा नहीं हुआ। मुल्लई शाल तक से सार्वजनिक परहेज का नाटक मोदी के उस सियासत का हिस्सा है, जिसमें वह कट्टर से घोर कट्टर छवि ग्रहण करते जा रहे हैं।
बकौल संघ के विचारक, मोदी की कोशिश का सियासी मकसद बीजेपी को समझने के लिए फिर से दो मानक तैयार कर देने का है। ताकि मोदी के कट्टर हिंदुत्व वाले मापदंड की तुलना में ठीक उसी तर्ज पर आडवाणी को आसानी से मुलायम और गैर सम्प्रदायिक ठहराया जा सके। जिस तर्ज पर कभी आडवाणी की तुलना में वाजपेयी को सर्वग्राही बनाया गया था। मतलब इतिहास दोहरा रहा है। मोदी के प्रति आडवाणी की हिकारत इसी सोची समझी रणनीति का विस्तार है। बीजेपी में उभरे दरार को पाटने के लिए यह मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के चिंतकों की तरफ से गढ़ा गया फलसफा है।
संघ चाहे जो दलील गढे़ और चाहे जिस किसी तरीके को अपनाए लेकिन सियासी सच है कि संघ का नेतृत्व कर रहे कनिष्ठतर नेताओं से लालकृष्ण आडवाणी बेहद दुखी हैं। यह दुख ही उनको नीतीश कुमार के सरजमीं को सलाम करने के लिए मजबूर कर रहा है। आडवाणी को पता है कि नीतीश कुमार के बिहार की धरती अपने घोर जातिवादी चरित्र के पाप को धोने के लिए हमेशा से बाहरी नेताओं को आयातित करती रही है। उत्तर आधुनिक समाजवादी राजनीति के प्रणेता स्वर्गीय मधु लिमये हों या जार्ज फर्नांडिस इनको बिहार की जनता ने पलकों पर बैठाया है। समाजवाद के बिखराव की आंधी में अपने वजूद को बचाने के लिए मुजफ्फरपुर, बांका और नालंदा संसदीय सीट बाहरी नेताओं के लिए सदा महफूज रही है। इतिहास है कि बाहरी खूबियों को अपनाने की आदी बिहार की जनता ने महात्मा गांधी को हाथों हाथ उठाए रखा। अंग्रेजों को भगाने के लिए आंदोलन का शंखनाद बिहार के निल्हा कोठी के मजदूरों के जरिए किया गया। ऐसे में मुमकिन है कि बिहार मोह में फंसते दिख रहे लालकृष्ण आडवाणी के मोदी से फासला बनाने क्रम जारी रहे। और अहमदाबाद की जनता को अलविदा करने के मकाम तक पहुंच जाए।
राम मंदिर आंदोलन के प्रणेता आडवाणी मान चुके हैं कि पिछले पाप से परहेज करना जरूरी है। सर्वग्राही बने बिना और प्रधानमंत्री की कुर्सी का लक्ष्य हासिल करना नामुमकिन है। आडवाणी को लग गया है कि जीवन के आखिरी लक्ष्य को हासिल करने के लिए वाजपेयी जैसा मुलायम रुख अपनाना अनिवार्य है। प्रधानमंत्री के लक्ष्य के लिए लालायित आडवाणी को बीजेपी के झंडे से गेरूए रंग को धो साफ कर समाजवादी नीतीश कुमार के झंडे का एकमात्र हरा रंग कबूल करने को तैयार हैं। ऐसे में मुमकिन है कि मोदी की तुलना में बेहतर प्रशंसा के काबिल समझे जा रहे नीतीश कुमार से आडवाणी कहें कि अब वो बडे नेताओं की पालकी ढोने के अपने धर्म का फिर से निर्वाह करें। नीतीश ने जिस तरह लालू से हिसाब करने के लिए जार्ज फर्नाडिंस को ढाल बनाया उसी तरह आडवाणी को अपना लें। आडवाणी की पालकी ढोने की शर्त पर नीतीश कुमार को इस बार प्रधानमंत्री बनने की दावेदारी का परित्याग करना पड़ सकता है। नीतीश इसके लिए तैयार हैं या नहीं यह देखना बाकी है।
लेकिन आडवाणी का जो रूख दिख रहा है उसमें साफ है कि वो जीवन के आखिरी पडाव संपोषित संवर्धित राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ को सबक सिखाने के लिए तैयार नजर आ रहे हैं। यही वजह है कि हिंदू हृदय सम्राट की भूमिका में जी रहे नरेन्द्र मोदी के सामने आडवाणी सीधे आ खडे़ हो गए हैं। यह धीरता आडवाणी के प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने की सफर के सियासत की जरूरत है। यह जरूरत आडवाणी को मोदी के राज में जाकर मंच से नरेन्द्र मोदी के प्रति खुले तौर पर घृणा का इजहार करने वाले नीतीश कुमार की तारीफ करने की स्थिति पैदा कर रहा है। यानी आडवाणी से मोदी के सीने पर मूंग दलने की हिमाकत करवा रहा है। यही जरूरत आडवाणी को कांग्रेस की दलील पर चलकर यह कहने को मजबूर कर रहा है कि गुजरात की तरक्की गुजरातियों की वजह से है। छिपा संदेश है कि मोदी नाहक श्रेय ले रहे हैं। मतलब मोदी हों या बघेला कोई फर्क नहीं पड़ता। गुजरातियों का मिज़ाज है कि वो तरक्की किए जा रहे हैं।
सवाल है कि लालकृष्ण आडवाणी गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से सीधा टकराव क्यों मोल ले रहे हैं? खासकर जिनके रहमोकरम पर वो अहमदाबाद लोकसभा में निरंतर चुनकर आते हैं। उनसे विवाद मोल लेते हुए आडवाणी को क्या कोई डर नहीं सता रहा है? जीवट मोदी की कुख्यातपन से तो गुजरात में बडे़-बडे़ दिग्गज पानी भरते हैं। गुजरात की कमान सम्हालते ही मोदी ने जिस तरह से राज्य में बीजेपी के लिए निर्विकल्प रहे केशूभाई पटेल और काशीराम राणा सरीखे नेताओं को बत्ती लगाकर रख दी। कभी राजनीतिक गुरु रहे शंकर सिंह बघेला को कुशाग्र मोदी ने कांग्रेस के हाथों में बंधे रहने को मजबूर कर दिया। आडवाणी के करीबी होकर दाएं बाएं देखने की चेष्टा करते रहे हरेन पाड्या जैसे प्रतिभावान नेता की हत्या हो गई। राजनीति मजबूरी है कि न्याय की गुहार लगा रहे पांड्या के परिजनों से आडवाणी गुजरात की धरती पर मिल पाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे।
ऐसे में लगातार मजबूत होते दिख रहे मोदी से आडवाणी के टकराव के निहितार्थ को बारीकी से समझने की जरूरत है। नरेन्द्र मोदी के सद्भावना यात्रा के टाइमिंग को लेकर कई सवाल किए गए। साफ कहा गया कि लालकृष्ण आडवाणी की प्रधानमंत्री पद पर
दावेदारी को खत्म करने के लिए संघ के नेताओं से मिले संकेत पर ही मोदी को ब्रह्मास्त्र के तौर पर इस्तेमाल किया गया। दिखने लगा है कि अब इस ब्रह्मास्त्र की काट से ही नरेन्द्र मोदी से हिसाब किताब साफ करके आ़डवाणी अश्वमेघ यज्ञ का निष्पादन करना चाहते हैं। इसलिए भी बीजेपी के अंदरुनी जंग का मुकाबला दिलचस्प हुआ जा रहा है।
लेखक आलोक कुमार करीब दो दशक से मीडिया में सक्रिय हैं. विभिन्न न्यूज चैनलों, अखबारों, मैग्जीनों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. उनसे संपर्क This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. के जरिए किया जा सकता है.