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वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (पंद्रह) : हजार समस्या का एक समाधान मुखिया जी

पर्ची बांटने के दौरान व्यक्ति और समाज दोनों के अलग-अलग रूप देखने को मिले। सबकी अपनी-अपनी समस्या, अपना-अपना दर्द। और सबका एकमात्र समाधान मुखिया जी। बेटा सम्मान नहीं देता है तो दिलाएं मुखिया जी। पड़ोसी ने नाली तोड़ दी है तो बनवाएं मुखिया जी। खेत में पानी नहीं आ रहा है तो पानी लाएं मुखिया जी। इंदिरा आवास नहीं मिला तो दिलवाएं मुखिया जी। स्कूल में मास्टर साहब नहीं आते हैं तो बुलवाएं मुखिया जी। हजार समस्या का एक समाधान मुखिया जी। पंचायत की हर समस्या के समाधान का जिम्मा है मुखिया जी के हवाले।

पूर्णाडीह में बुजुर्ग मिले। बुढ़ापा उन पर हावी था। बेटा सम्मान नहीं देता है। बीडीओ इंदिरा आवास नहीं देता है। वोट तो उसी को देंगे, जो इंदिरा आवास दिलवा दे। लोग वोट की कीमत नहीं मांग रहे थे, पर मुआवजे की उम्मीद जरूर कर रहे थे। कुराईपुर में कुछ लोग एक दुकान के पास बैठे थे। उनसे बातचीत की शुरुआत हुई। उसमें से एक व्यक्ति ने कहा कि दुकान के सामने चापाकल खराब पड़ा है, उसको बनवाने के लिए पैसा दे दीजिए। फिर उन्होंने इसको लेकर भूमिका बांधी। इसके साथ उन्होंने कहा कि सादिक जी से कहेंगे तो चापाकल बनवा देंगे। सादिक खान भी उसी गांव के रहने वाले उम्मीदवार थे। मैंने कहा कि तो आप चापाकल उन्हीं से बनवा लीजिए। और विडंबना कि मतदान के एक दिन पहले जब उस गांव में गया तो चापाकल खराब ही पड़ा था। पूर्णाडीह के रणजीत कुमार की दुकान कारा मोड़ पर है। उससे कहा कि चुनाव चिह्न मिल गया है। अब आप लोग जुट जाइए चुनाव में। उसने बड़े अधिकार के साथ कहा कि भैया, खरचवा भिजवा दीजिए ना।

भाजपा के एक कार्यकर्ता हैं सुरेंद्र सिंह। पार्टी के प्रति समर्पित हैं। उनसे जब मैं पहली बार मिला था तो उन्होंने कहा कि अभी माहौल देख रहे हैं। कई उम्मीदवार आएंगे। लेकिन जब दूसरी बार मिला तो उनका तेवर एकदम बदला हुआ था। जाति के कुशवाहा थे। एकदम कोइरी के देवता। उन्होंने बड़ी ईमानदारी से कहा कि नोमिनेशन के दिन अनिल मालाकर के साथ थे। पर्चा भरने के बाद उन्होंने सबको मिठाई के पैकेट दिये। और उस दौरान पहुंचे सभी कार्यकर्ताओं को खरचा-पानी के लिए दो-दो सौ रुपये भी दिए। भाई हमारा परिवार अब उनको ही वोट देगा। अब मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं बच गया था।

खरांटी पंचायत का सबसे बड़ा गांव है। इसमें चार बूथ हैं। प्रचार के दौरान ही एक गुमटी वाले से मुलाकात हुई। गुमटी पर बैठा। बातचीत हुई। यहीं एक चादर ओढ़े व्यक्ति भी बैठे हुए थे। चिलम फूंकने की तैयारी हो रही थी। फिर वही खरचा-पानी की मांग। मैंने कहा कि हम चंदा लेकर चुनाव लड़ रहे हैं और हमसे खर्चा मांग रहे हैं। आप लोग ही हमें कुछ चंदा दीजिए। वहां चादर ओढ़े व्यक्ति ने पूछा कि चंदा मिल रहा है। मैंने कहा कि जनता सहयोग मांगने पर देती ही है। शाम का समय था। अंधेरा गहराने लगा था। अब हम बस पकड़ने की हड़बड़ी में थे। चादर ओढ़े व्यक्ति ने कहा कि हमको पहचानते हैं। मैंने कहा कि नहीं। उन्होंने बताया कि मेरा नाम अजय लाल है और हम भी उम्मीदवार ही हैं। उनके नाम से परिचित ही था। मैंने कहा, चलिए आप से मुलाकात हो गयी। अब तो मिलते रहेंगे।

रामलगन बिगहा के लोगों की समस्या भी अपनी थी। एक साव जी के घर के पास पानी पीने के बहाने ठहरा। साव जी थे, इसलिए पानी के साथ गाजा भी आया। एक वृद्ध महिला आयीं और अपनी समस्याओं का पिटारा खोल दिया। सड़क ऊंची हो गई है। घर का पानी नहीं निकलता है। अगर नाली बन जाएगी तो घर से पानी निकलने लगेगा। लोग मुखिया बन जाते हैं और फिर भूल जाते हैं। हमारी समस्याओं की ओर ध्यान नहीं देते हैं। हर दरवाजे पर नयी समस्या स्वागत के लिए खड़ी मिलती थी। किसी को आंगनबाड़ी सेविका से शिकायत है तो किसी को शिक्षकों से। किसी को अपने पटीदार से भी शिकायत थी। झगड़ा गलियों का था, तो नालियों का भी। कई जगहों पर झगड़ा खड़ा कर न्याय के लिए लाठी के साथ तैनात भी मिले। इंदिरा आवास से लेकर सोलर लाइट तक की उम्मीद मुखिया जी से ही थी। अभी हम मुखिया बनने की प्रक्रिया में थे और लोग समाधान की अपेक्षा मुखिया के तरह कर रहे थे। लोगों की अपेक्षाओं की कोई सीमा नहीं थी और मेरे पास झूठा दिलासा देने का अलावा कोई विकल्प नहीं था।

(जारी)

लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्तान और प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं. फ़िलहाल बिहार में समाजवादी आन्दोलन पर अध्ययन एवं शोध कर रहे हैं. इनसे संपर्क This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. के जरिए कर सकते हैं.


इसके पहले के भागों के बारे में पढ़ने के लिए क्लिक करें : वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा

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