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यादे! कितने सरल और सहज थे अतुल माहेश्वरी

अतुल जी मालिक कम, मगर दोस्त जैसे ज्यादा थे !

आज स्व. अतुल माहेश्वरी जी की तीसरी पुण्य तिथि है। तीन साल हो गए। मगर उनके साथ के कई संस्मरण ऐसे हैं, जो जीवन भर याद रहने वाले हैं। उन संस्मरणों को याद करते वक्त कभी-कभी यह यकीन ही  नहीं होता है कि ये यह सब यादें एक मालिक और नौकर के बीच की है! उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी ख़ास बात यही थी कि उन्होंने न तो खुद कभी छोटे से छोटे से कर्मचारी के साथ एक मालिक के अहंकार कोखुद पर लाद कर बात की और न ही कभी खुद यह अहसास किया कि वह एक अखबार के मालिक हैं और सामने वला उनका नौकर। अक्सर यही होता था कि एक स्वाभविक संकोच और दूरी बनाने में भी मुश्किल सी आती थी। अपने शहर से लेकर प्रदेश और देश के तमाम मुद्दों पर और उन पर स्टैंड लेने का उनका अंदाज़ अक्सर एक अखबार मालिक का नहीं था, ऐसा लगता था कि था कि जैसे कोई जनाधिकार वादी किसी से भी टकराव लेने में संकोच नहीं करता और हाँ शर्त यह है कि मुद्दा जनहित का और सत्य पर आधारित होना चाहिए। उन्होंने समझौते नहीं किये ऐसा नहीं है, मगर उन्होंने यह देख लिया कि अखबार के पार्ट पर कमी रह गयी है। जितने सख्त थे उससे कहीं जयादा नरम। मुझे तो अपने एक कर्मचारी की हैसियत से की वह तमाम बातें याद हैं जो अक्सर हतप्रभ कर जाती थी और हृदयपटल पर अंकित हो गयीं हैं।


अतुल जी जहाँ हमेशा एक मालिक कम और दोस्त ज्यादा नज़र आये। हमें खुद अपने आप को नौकर समझना था उन्होंने कभी अहसास नहीं करवाया। अगर कभी कुछ गलत भी कर दिया या हो गया तो उन्होंने कुछ कहा नहीं। सदैव एक प्राकृतिक  मुस्कराहट भरा चेहरा सदैव  दिल में बसा रहता है। आदरणीय अशोक जी से हमेशा भय  सा लगा रहा, उनके सम्मान में, मगर कभी-कभी ऐसा भी हुआ कि अपना डर उनसे कह दिया तो उन्होंने बात सम्हाल ली। उनके मेरठ चले जाने की बाद आदरणीय राजुल जी ने भी असीम विश्वास, प्यार और सम्मान दिया। स्व. अनिल जी की असामयिक मृत्यु के बाद आदरणीय अशोक भाई साहब को आगरा जाना पड़ा तो अधिकतर कार्यकाल श्री राजुल जी के साथ  ही उनके निर्देशन में बीता। उनसे बहुत कुछ सीखा। काम की व्यवस्था और व्यवस्थित काम कैसे किया जाए, यह हमेशा राजुल जी की प्राथमिकता रही। वह लक्ष्य उन्होंने छू भी लिया।

मुझे याद है कि १९८५ में जब मैंने अमर उजाला में प्रशिक्षु की नौकरी शुरू की तब से लेकर उनसे  कई मुलाकतें हुई, हर बार कुछ ना कुछ ऐसा कर गए कि बस यादगार हो गयी। आखिरी बार उनसे मुलाकत बरेली के रेलवे स्टेशन पर हुई। उन्हें तब दिल्ली-लखनऊ मेल का इंतज़ार था और स्टेशन पर खड़े थे, ट्रेन के इंतज़ार में, काफी देर बात हुई, मैं ही तब अमर उजाला से बाहर था , ऐसे जैसे अब न इस्तीफा ना बर्खास्तगी न काम ना दाम। मगर हमारी बात में कहीं इस तरह का कोई सन्दर्भ नहीं आया। एक घंटे से भी ज्यादा समय तक देश प्रदेश की राजनीति और बरेली के तमाम लोगों के हल चाल लेते रहे। मुझे लगा कि शायद मैं ही  बिना वजह उनका समय ले रहा हूँ और मुझे अब चले जाना चाहिए, जैसे ही मैंने अनुमति लेनी चाही बोले अरे अभी तो ट्रेन देर में आएगी यही रुको! उनका यह कहना बेहद अपनापन लिए था। वैसे मुझे यह सौभाग्य हासिल है कि उन्होंने कभी मुझे तो खासतौर से यह अहसास ही नहीं होने दिया कि मैं एक नौकर हूँ। हालांकि मुझे यह भी सौभाग्य हासिल है कि अमर उजाला के सभी मालिकों- आदरणीय अशोक जी, स्व. अनिल जी और अब अमर उजाला के  प्रबंध निदेशक के रूप श्री राजुल जी सभी के असीम स्नेह और और सम्मान और अधिकारों के रूप में विश्वास मिला है। तो उस रात रेलवे स्टशन पर जब ट्रेन आयी तो मैं और अतुल जी, साथ में श्री सोमविग भी थे उन्हें ट्रेन पर बिठाने गए, और जब ट्रेन चलने को थी तभी एक दम श्री अतुल जी बोले आशीष जरा भाग के पानी की बोतल तो ला दे, मैं हैरान था कि अगर मैंने बोतल ले भी ली भी प्लेटफार्म नंबर तीन पर वापस आने से पहले ही ट्रेन चल दी तो…!वापस आने पर मैंने पुल से ही देखा लिया था कि ट्रेन रेंगने लगी है दौड़ लगाईं और किसी तरह भाग कर मैंने दरवाजे पर उन्हें पानी की बोतल पकड़ा दी। लखनऊ मेल में एसी कोच एक दम आखिर में लगता है।

मैंने जब अमर उजाला ज्वाइन किया तब से लेकर शुरू के तीन माह तक मैंने कोई वेतन नहीं लिया मुझे पता ही नहीं था कि मुझे भी कुछ मिलेगा, और मैंने सोचा मिलना है तो खुद ही मिलेगा। वह टाइम अखबारों का ऐसा ही था मगर अमर उजाला उस श्रेंणी में नहीं था। खैर, तीन माह बाद एक दिन रत के समय अतुल जी आये मेरे टेबल पर और बोले आशीष हमने आपके दो सौ रुपये बढ़ा दिए हैं। मैं चुप था। फिर बोले ठीक है? मैं फिर चुप था। फिर बोले क्या बात? मैंने कहा भाई साहब मुझे पता नहीं कि कितने में दो सौ रुपये बढे हैं? बोले मतलब? मैं फिर चुप था। एक दम मुकुराते हुए मेर हाथ पकड़ा और एकाउंट में श्री गिरीश जी के पास ले गए, मुझे लगा कि पता नही क्या होगा? कहीं गिरीश जी को न लगे कि मैंने कोई शिकायत की है! तब खुद ही उन्होंने गिरीश जी से पूछा आप इन्हें जानते हैं? जवाब न में था, गिरीश जी बोले ये हमारे पास आये ही नहीं कभी। तब मुझे थोड़ी सांस आयी। बोले आपने इनको सैलरी ही नहीं दी? अच्छा अब दे दो और शुरू से उतने ही दो जितने आज बढ़ाने के बाद मैंने की है। यह ज़िंदादिली और काम से खुश होने के बदले किसी को कुछ देने की इच्छा उनके मन में हमेशा रहती थी।

मैं तो एक प्रशिक्षु ही था। और मालिक का सामना करना मुझे बड़ा काम लगता था। मगर यह क्या, अक्सर रात में नौ दस बजे के बाद जब मैं अगले दिन के लिए ख़बरें लिख रहा होता था तो वह मेरे बगल वाली टेबल पर आकर बैठ जाते थे और कहते लाओ कुछ खबरें दो, मैं लिखता हूँ। मेरी धड़कन फिर बढ़ जाती थी।क्योंकि की इसी के साथ वह मेरी लिखी हुयी ख़बरें भी देख लिया करते थे। मगर अक्सर जब भी वह पास आकर बैठे कभी उन्होंने यह अहसास नहीं करवाया कि कि एक मालिक और सम्पादक मेरे साथ है। एक रात के १२ बज गए। मैं काम ही कर रहा था। आये और बोले अब तुम जाओ और ख़बरें मेरी टेबल पर रख दो। एक-एक लाइन वह खुद चेक करते थे। चाहे खबर हो या लेख या कुछ और। तभी एक खबर जो मैंने लिखी थी वह यह थी कि पिथौरागढ़ में बंद पड़ी एक सीमेंट फैक्ट्री चालु करने की घोषणा डीएम और मज़दूरों की वार्ता में तय हुई। मैंने खबर की शुरुआत यह कर दी कि "कल यहाँ हुयी वार्ता के बाद।" बस उनकी एक निगाह पहले पड़ी और बोले याद रखो कभी जीवन में "कल" से किसी खबर की शुरुआत मत करना।

यह उनकी विरासत थी। और यह परम्परा अमर उजाला में कार्पोरेट होने से पहले तक रही। अतुल जी के अलावा श्री अशोक जी और राजुल जी तक ने इस मामले में कभी कुछ संकोच नहीं किया। और रात के दो और तीन बजे तक यह सारे लोग काम में ऐसे लगे रहने वाले रहे कि जैसे कोई कर्मचारी हो। तब के दौर में कानाफूसी और जिसे बैकबाइटिंग कहते हैं वो चीज़ नहीं थी। यह सब तब से पनपी जाब मैनेजरों क अखबारों में प्रवेश हुआ। यह जादूगर जैसे होते थे और अब तो बहुतायत में हैं। तब हालंकि यह मैनेजर अखबार के प्रसार और विज्ञापन में इजाफे के लिए अखबारों में लाये गए  मैनेजरों का सम्पादकीय से वास्ता नहीं होता था, मगर इनकी निगाह वहीँ लगी रहती थी, अपने काम को छिपाने के लिए यह लोग पत्रकारों को ही देखने में अपना भला समझते रहे हैं। तब केवल सम्पादक ही पत्रकारों के लिए सब कुछ होते थे। यही वजह है कि पत्रकारिता में  दलाली शुरू हो गयी और इस कदर मीडिया बदनाम है कि कुछ सोचा नहीं जा सकता।

एक बार मुज़ाफरनगर में तैनाती के दौरान मेरी तबियत खराब थी। मैंने फोन किया भाईसाहब मैं जाना चाहता हूँ बरेली। तबियत ठीक नहीं है। पूरा हाल पूछा और बोले चले जाना बरेली, मगर यहाँ मेरठ आ जाओ, अच्छे डाक्टर हैं कह दूंगा और दिखाने के बाद बरेली चले जाना और वहाँ डॉक्टर सुशील टंडन के संपर्क में रहना और यह भी बोले आ सकते हो तो बस से आ जाओ वरना टैक्सी ले लो। मैं बस से मेरठ गया। जैसे ही आफिस पहुंचा यह क्या! भाई साहब सारे मैनेजरों से घिरे बैठे थे, अपने चैम्बर का दरवाज़ा वो कभी बंद नहीं करते थे। मुझे देखते ही बिना कुछ किसी को बोले खुद अपनी सीट से उठे और मेरे उनके चैम्बर तक पहुंचने से पहले ही मेर हाथ  पकड़ा और अपनी गाड़ी पर आये वहाँ उनके चालक श्री ईश्वरी जी को आवाज़ दी और बोले इन्हे जसवंत अस्पताल ले जाओ फलां डाक्टर के पास, मेरी बात हो गयी है। वहाँ उन्होंने जिस डाक्टर को बोला होगा उसने अपने किसी साथी को ऐसा सन्देश दिया कि अतुल जी आ रहे हैं। उस डाक्टर साहब ने मेरे पेट पर हाथ लगाया और बोले कि अतुल जी कहाँ दर्द है आपके? मैं हैरान था  मैंने उन्हें बताया कि.……डॉक्टर साहब मैं अतुल जी का नौकर हूँ। यह एक ऐसे घटना थी कि इस के आगे क्या कहा जा सकता है!

अमर उजाला का जब मुरादाबाद संस्करण शुरू हुआ तो मुझे वहाँ भेजा गया। १९८९ में। मई फरवरी में वहाँ चला गया था। सितम्बर महीने में एक दिन भाई साहब मेरठ से आये। अपने चैम्बर में बैठ गए। काफी देर बाद मुझे बुलाया। और बोले चलो। मैं हैरान। कहाँ जाना है। मैं चुप था। पूछने का साहस नहीं था। फिर खुद ही बोले बरेली चल रहे हैं। बैठो गाडी में। मैंने कहा कि भाई साहब अपने कपडे अटैची तो उठा लूँ! बोले सब आ गया। मैंने कहा कुछ कपडे सुख रहे हैं। बोले वो भी आ गए। मई फिर हैरान था। दर असल उन्होंने मुरादाबाद दफ्तर में आते ही एक पुराने कर्मचारी भंडारी से यह सब करवा लिया था। भंडारी मेरे साथ ही रहते थे। रास्ते में मुझे बताया कि कहाँ जा रहे हैं। दर असल उस समय बरेली से दैनिक जागरण शुरू हो रहा था। हालांकि यह वापस मेरे करियर के लिए लगभग अभिशाप बन गयी। मगर यहाँ फिर उन्होंने मुझे जीवन का यादगार तोहफा दिया। अक्टूबर या नवम्बर महीने की बात है। बरेली में फिर मुझे अपने चैम्बर में बुलाया। मैंने सोच फिर कुछ गड़बड़ हो गयी कहीं, मैं उनके चैम्बर में पहुंचा। बोले बैठोगे नहीं, मैंने कहा बताइये आप, बोले बैठो। एक हलकी सी गम्भीर चुप्पी के साथ एक क्षण शांत रहे। मैंने इसी गम्भीरता उनके चेहरे पर काफी बड़े मसले पर देखी थी। फिर ऐसा है आशीष ---(मेरी फर हवा खराब), हमने तुम्हारा प्रमोशन कर दिया है। मैंने कहा ठीक है भाई साहब। आगे बोले ऐसा है कि सीनियर सब करेंगे तो कोई फायदा नहीं है। मतलब तुम्हे वेतन में कोई फायदा नहीं होगा इसलिए हमने तुम्हे चीफ-सब बना दिया है। मैं चुप था। पूछा कि खुश हो? मैं फिर चुप था। इस डर से कि पता नहीं अब क्या काम करना पड़ेगा! कर भी पाया या नहीं ? यह उनकी और और ईश्वार की तरफ से मेरे जीवन में अब तक मुझे मिला पहला और आखिरी तोहफा था ! इसके बाद जब मैं उनके चैम्बर से बाहर आया और मैंने अपने साथियों को बताया तो कुछ के चेहरे तमतमा गए थे। और तभी मैं अखबार के इन सब मालिकों का रिश्तेदार बन गया। अमर उजाला के इतिहास में शायद यह तब पहला मौक़ा था जब एक उपसम्पादक डेढ़ साल में  ही चीफ-सब बन गया।

हाँ, मैं रिश्तेदार तो हूँ रहूँगा वो रिश्ता ऊपर वाले ने बनाय था, मगर रिश्तेदारी अतुल जी या राजुल जी से नहीं थी। इनसे से मुझे जो मिला वो सिर्फ और सिर्फ मेरी मेहनत और लगन थी और अखबार के लिए समर्पित होकर काम करना जिसने मुझे आज भी सबकी नज़रों में एक अलग दर्ज़ा ही दे रक्खा है, मगर इस दर्जे ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा, न मालिक न कर्मचारी। अशोक जी हों या या अतुल जी और यहाँ तक कि अनिल जी भी, ये मालिक अपनी न्यायप्रियता के लिए आज भी उन सारी लोगों के दिलों में राज करते हैं जिन्होंने उनके साथ काम किया है। इन्होने किसी को भी लवारिस या किसी और के भरोसे नहीं छोड़ा। हमेशा मेहनत और समर्पण के बदले बिना कहे वो दिया जिसकी लोगों को कल्पना भी नहीं थी। इन सबकी न्यायप्रियता सभी कर्नचारियों का इतना बड़ा भरोसा थी कि अमर उजाला का एक छोटा सा कर्मचारी भी शेर बना रहता था।

मालिकों के अथाह विश्वास और सम्मान की वजह हालांकि मेरे लिए अभिशाप बन गयी। मुझे मालिक कहा जाने लगा और ना जाने क्या, जैसा कि एक मालकों के करीब हो जाने वाले कर्मचारी के साथ होता है , इसका बहुत बड़ा कष्ट मुझे झेलना पड़ा और आज भी झेल रहा हूँ। मगर मुझे आज भी इसका कोई मलाल नहीं है, क्योंकि थोड़े समय का ही मेरा कार्यकाल मेरे जीवन की बड़ी निधि है। मगर मेरे कुछ भाइयों ने अपनी तरक्की के लिए मेरे और मालिकों की बीच में मतलब मुझे औकात में लगाने के लिए मुझे मालिक कहना शुरू कर दिया। यहाँ तक कि मैं हैरान था जब १२ साल बाद मैंने अमर उजाला फिर से फर्रुखाबाद में ज्वाइन किया तो वहाँ के लोगों ने भी मुझे ऐसा ही अहसास दिलाया, मैं जानता था कि यह फीडिंग उन्ही लोगों की है जो तब भी मेरे खिलाफ सक्रिय थे, और मेरे न होने पर ही उन्हें खुद को पहाड़ की ऊंचाइयों को छू लेने का भरोसा था। वह सफल भी हुए। और खुद की सफलता के लिए किसी को गड्ढे में डालने वालो को गलत नहीं कहा जाना चाहिए। मैं भी नहीं कहता। मुझे उनसे कोई शिकायत है और न है। हाँ, मगर अन्याय और असत्य को जब स्वीकार कर लिया जाये तब टींस तो रहती है।

यह तो कुछ बातें हैं जो आज स्व. अतुल जी के बहाने याद आ गयीं, मेरे पास शायद अनगिनत संस्मरण हैं, जिनके बारे में लिखा जाए तो शायद एक ऐतिहासिक पुस्तक बनेगी, क्योंकि सबकी अपनी अपनी खूबियां हैं जो के किसी भी अखबार और बड़े घराने के मालिकों में नहीं पायीं जा सकती। 

लेखक से संपर्क उनके ईमेल This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. पर किया जा सकता है।

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