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ड्राइवर की आकस्मिक मौत, उससे जुड़े सवाल और दो अखबारों की रिपोर्टिंग

कल का दिन उत्तर प्रदेश में बहुत अधिक चहल-पहल का दिन था पर मेरे लिए यह दिन एक दूसरे ही रूप में आया. सुबह लगभग 08.40 बजे मुझे अचानक मोबाइल पर मेरे कार्यालय के ही एक कर्मी ने सूचित किया कि ओम प्रकाश पाल का शव प्रातः वायरलेस मुख्यालय परिसर में कॉन्फ्रेंस रूम के पीछे स्थित एक पुलिस बैरेक के ठीक सामने मिला है. पाल एक आरक्षी चालक थे जो पुलिस लाइन, लखनऊ में तैनात थे और रूल्स एंड मैनुअल कार्यालय, उत्तर प्रदेश, लखनऊ के साथ संबद्ध थे.

वे मेरे साथ पिछले लगभग दो माह से संबद्ध थे और मुझे मिला सरकारी एम्बेसेडर कार चलाते थे. स्वाभाविक है कि जिस व्यक्ति ने एक दिन पहले ही शाम को मुझे मेरे घर पर छोड़ा हो, मुझसे छुट्टी ले कर घर जाने की बात कही हो, जिसकी बेटी की शादी अभी महीने भर पहले तय हुई हो, जो काफी हंसमुख और मिलनसार स्वभाव का हो, उसका अचानक से इस प्रकार चला जाना मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था. साथ ही इस बात से मुझे काफी धक्का सा भी लगा था. यह खबर सुन कर मैं तत्काल अपने निजी वाहन से घटनास्थल पर पहुंचा.

वहाँ पहले से ही दीपिका गर्ग, पुलिस अधीक्षक, ट्रांसगोमती एवं कई अन्य अधिकारी मौजूद थे. ओम प्रकाश पाल का शव पुलिस बैरेक के ठीक सामने मिले चित्त अवस्था में पड़ा हुआ था. दोनों हाथ फैले हुए से थे. चेहरा आसमान की तरफ था. शरीर पर सरकारी वर्दी और कमर में बेल्ट था. शरीर पर कहीं और चोट के निशान नहीं दिख रहे थे और सिर पर पीछे एक घर सा चोट दिख रहा था. शव जिस अवस्था में और जिस प्रकार से पड़ा हुआ था उससे सीधे-सीधे उनकी हत्‍या किये जाने की आशंका व्यक्त हो रही थी. वह शव जिस बैरेक के सामने पड़ा था, वह पूरी तरह से खाली था. वहाँ रहने वाला एक भी सिपाही नहीं दिख रहा था. यह बात पूरे मामले को और भी रहस्यमय बना रहा था. मैंने इन सारी बातों के दृष्टिगत पाल की मृत्यु से सम्बंधित एफआईआर थाना महानगर, लखनऊ पर बनाम अज्ञात स्वयं दर्ज कराया. मेरी जानकारी में अभी इस मामले में तफ्तीश जारी है.

यह घटना मेरे लिए अत्यंत कष्टप्रद था. वैसे तो पुलिस में रहते हुए मर्डर और डेड बॉडी देखने की आदत हो गयी है, पर जब अपना कोई प्यारा ऐसे मारा जाता है तब मर्डर का असली मतलब समझ में आता है. वही पाल जो कल तक बोलते नहीं थकता था, आज बिलकुल चुपचाप पड़ा हुआ था. जैसे हम सबों से यकायक रूठ गया हो. मेरे मन में यही बात रह-रह कर आ रही थी कि काश मरे हुए लोग फिर से आ कर बोल पाते तो हम कितनी आसानी से यह जान सकते कि कल रात क्या-क्या और कैसे-कैसे हुआ था. पर हम सभी जानते हैं कि ऐसा नहीं हो पाता. इस बार भी ऐसा नहीं हुआ. अब तो महानगर पुलिस पर निर्भर है कि वह इस घटना का रहस्य खोल पाएगी या नहीं.

इसके बाद एक विचित्र बात मैंने कुछ अखबारों में इस सम्बन्ध में छपी खबर में भी देखी. दैनिक जागरण और हिंदुस्तान प्रदेश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में हैं. पर इस घटना को प्रस्तुत करते समय इनके सम्बंधित संवाददाताओं ने बहुत ही महत्वपूर्ण तथ्यों को जाने-अनजाने गलत ढंग से प्रस्तुत कर दिया. दोनों अखबारों में यह लिख दिया गया कि पाल का शव बैरेक के अंदर उनके बिस्तर पर मिला था, जबकि सत्यता यह है कि उनका शव गेट के बाहर मैदान में पड़ा मिला था. “हिंदुस्तान” में तो सम्बंधित संवाददाता ने यह भी लिख दिया कि पाल का बिस्तर खून से सना हुआ था जबकि संभवतः बिस्तर पर खून का एक भी निशान नहीं था.

आज भी आम लोगों की निगाह में समाचार पत्र अत्यंत सम्मानित होते हैं. इसमें प्रकाशित तथ्य आमजन द्वारा अकाट्य सत्य के रूप में स्वीकार किये जाते हैं तथा कई बार इनका प्रयोग सभी सम्बंधित व्यक्ति आगे चल कर मुकदमों में न्यायालयों आदि में भी कर लिया करते हैं. ऐसे में मेरी दृष्टि में सम्बंधित पत्रकारों को ऐसी गंभीर भूलों की ओर विशेष रूप से जागरूक रहना आवश्यक प्रतीत होता है, क्योंकि इन बातों का गहरा और दूरगामी महत्व है.

अमिताभ ठाकुर

आईपीएस

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